Saturday, March 13, 2010

कभी महफ़िल में रोये कभी मैखाने में रोये
आंसूं आँखों से टूटकर जाके पैमाने में रोये

देखे थे जो भी ख्वाब तेरे साथ जिन्दगी के
वो मुझसे लिपट कर के मेरे सिरहाने में रोये

मेरे आंसू बहे बहुत पर खरीददार मिला

रोने को तो हम जाके सरे ज़माने में रोये

मेरी जिंदगी की कमाई मेरे इश्क के जज्बात

जो तूने भुला दिया उस अफ़साने में रोये

तू रूबरू है मेरे पर मेरा हाल कुछ ऐसा है
बिन हाथ का भिखारी जैसे खजाने में रोये
तुझे मोहब्बत है बेहिसाब यही सोचता थे हम
तेरी हर झूटी आह पर हम अनजाने में रोये
किस मोड़ पर लाया ये मुस्कुराने का सफ़र

मेरी हंसी लब छोडके दिल के वीराने में रोये
मेरे रोने की सबब तू ये भी सोचले एक बार

कहीं मेरी मौत के बाद तू मुझे जलाने में रोये

देख ले बेवफा दिल से दी है तुझको दुआ

तेरा हर गम आकर के तेरे इस दीवाने में रोये

Wednesday, February 10, 2010

तेरे लिए

अगर हो सके तो बस इतनी इल्तिजा करना
फ़र्ज़ इस दोस्ती का कुछ अब तो अदा करना
जहाँ पर
भी रहे बस खुश रहे वो जिंदगी मेरी
अब मेरी जगह तुम उसके वास्ते दुआ करना


छुड़ा करके मेरा अब हाथ तुम कैसे जाओगे
दो कदम भी बिन मोह्हबत चल पाओगे
जब देखोगे जान जाते हुए अपने दीवाने

भरोसा है मुझे तुम भी तड़पकर लौट आओगे



छोड़ देने का तुझे कोई इरादा नहीं है
जबकि याद तुझे अपना कोई वादा नहीं है
निकाल भी देता तुझे दिल से मैं लेकिन
इस दिल में बस दरारे हैं दरवाजा नहीं है



मोहब्बत मर्द औरत की एक है जमाने के लिए
ये बात रहने दो अब यारो बस अफ़साने के लिए
परवाने जल के मर जाते हैं शमा की मोहब्बत में
कब जलती है शमा भला किसी परवाने के लिए

Tuesday, January 19, 2010


आरजू नहीं अब दुनिया की, तेरा दिल काफी है मेरे रहने के लिए

सारे अल्फाज किताबों में रहने दो तेरा नाम काफी है लेने के लिए

जब से मिले तुम मुझको तब से इस जिन्दगी की भी चाहत न रही

हवा की अब जरूरत क्या तेरी खुश्बू काफी है सांसो में बहने के लिए
कौन कहता है बिछड़ जाना अच्छा है
जुदाई से तो यार मर जाना अच्छा है
गर बाहें खुली हो तेरी समेटने के लिए
तो मेरा टूटकर बिखर जाना अच्छा है
ऐसा कोई मिल गया है जिन्दगी की राहों में
अब जिन्दगी कट जाये बस उसकी पनाहों में
चाहत होगी किसी को इतनी बड़ी दुनिया की
मेरी सारी दुनिया सिमट आई तेरी बाँहों में

चाहतें घर दूसरों का जलाना दुनिया में
मजहब है लहू गैरों का बहाना दुनिया में
कहते हैं अगर वों इसी दुनिया को जन्नत
तो मुझे दोबारा नहीं आना इस दुनिया में

कहाँ हैं वों लोग जो गैरों का भला करते हैं
जनाब एक नेकी को भी घंटो सलाह करते हैं
क्यों जल रहा है आज आदमी से ही आदमी
सुना तो था चरागों से चराग जला करते हैं

पहले इस सफ़र का रिवाज कहाँ ऐसा था
अंजाम ये हुआ है आगाज कहाँ ऐसा था
आज हंसती है खुद मुझपे मेरी ही हंसी
मेरा हंसने का पहले अंदाज कहाँ ऐसा था

तुझको ही सोचते-सोचते शाम होती है
मेरी आँखों से बयां ये सरेआम होती है
जब भी सोचता हूँ तुझे पाने के बारे में
मेरी मोहब्बत मुझपे ही इल्जाम होती है

मेरा दिल तो रहता है हरदम तेरे करीब में
पर मेरी मंजिल छुपी है जुदाई कि सलीब में
वों काम आजाये तेरी जुल्फों को सहलाने में
वों जो हवा लिखी है मेरी सांसों के नसीब में

Saturday, January 9, 2010

सूखे आंसू


जो तुमको हर बार रुला दे वो कहानी हूँ मैं
तेरे इस प्यार की उमर की ये जवानी हूँ मैं
बदकिस्मत हो जो प्यार हुआ भी तो मुझसे
तेरी आँखों से लगातार बहता हुआ पानी हूँ मैं