चाहतें घर दूसरों का जलाना दुनिया में
मजहब है लहू गैरों का बहाना दुनिया में
कहते हैं अगर वों इसी दुनिया को जन्नत
तो मुझे दोबारा नहीं आना इस दुनिया में
कहाँ हैं वों लोग जो गैरों का भला करते हैं
जनाब एक नेकी को भी घंटो सलाह करते हैं
क्यों जल रहा है आज आदमी से ही आदमी
सुना तो था चरागों से चराग जला करते हैं
पहले इस सफ़र का रिवाज कहाँ ऐसा था
अंजाम ये हुआ है आगाज कहाँ ऐसा था
आज हंसती है खुद मुझपे मेरी ही हंसी
मेरा हंसने का पहले अंदाज कहाँ ऐसा था
तुझको ही सोचते-सोचते शाम होती है
मेरी आँखों से बयां ये सरेआम होती है
जब भी सोचता हूँ तुझे पाने के बारे में
मेरी मोहब्बत मुझपे ही इल्जाम होती है
मेरा दिल तो रहता है हरदम तेरे करीब में
पर मेरी मंजिल छुपी है जुदाई कि सलीब में
वों काम आजाये तेरी जुल्फों को सहलाने में
वों जो हवा लिखी है मेरी सांसों के नसीब में