Tuesday, January 19, 2010


आरजू नहीं अब दुनिया की, तेरा दिल काफी है मेरे रहने के लिए

सारे अल्फाज किताबों में रहने दो तेरा नाम काफी है लेने के लिए

जब से मिले तुम मुझको तब से इस जिन्दगी की भी चाहत न रही

हवा की अब जरूरत क्या तेरी खुश्बू काफी है सांसो में बहने के लिए
कौन कहता है बिछड़ जाना अच्छा है
जुदाई से तो यार मर जाना अच्छा है
गर बाहें खुली हो तेरी समेटने के लिए
तो मेरा टूटकर बिखर जाना अच्छा है
ऐसा कोई मिल गया है जिन्दगी की राहों में
अब जिन्दगी कट जाये बस उसकी पनाहों में
चाहत होगी किसी को इतनी बड़ी दुनिया की
मेरी सारी दुनिया सिमट आई तेरी बाँहों में

चाहतें घर दूसरों का जलाना दुनिया में
मजहब है लहू गैरों का बहाना दुनिया में
कहते हैं अगर वों इसी दुनिया को जन्नत
तो मुझे दोबारा नहीं आना इस दुनिया में

कहाँ हैं वों लोग जो गैरों का भला करते हैं
जनाब एक नेकी को भी घंटो सलाह करते हैं
क्यों जल रहा है आज आदमी से ही आदमी
सुना तो था चरागों से चराग जला करते हैं

पहले इस सफ़र का रिवाज कहाँ ऐसा था
अंजाम ये हुआ है आगाज कहाँ ऐसा था
आज हंसती है खुद मुझपे मेरी ही हंसी
मेरा हंसने का पहले अंदाज कहाँ ऐसा था

तुझको ही सोचते-सोचते शाम होती है
मेरी आँखों से बयां ये सरेआम होती है
जब भी सोचता हूँ तुझे पाने के बारे में
मेरी मोहब्बत मुझपे ही इल्जाम होती है

मेरा दिल तो रहता है हरदम तेरे करीब में
पर मेरी मंजिल छुपी है जुदाई कि सलीब में
वों काम आजाये तेरी जुल्फों को सहलाने में
वों जो हवा लिखी है मेरी सांसों के नसीब में

Saturday, January 9, 2010

सूखे आंसू


जो तुमको हर बार रुला दे वो कहानी हूँ मैं
तेरे इस प्यार की उमर की ये जवानी हूँ मैं
बदकिस्मत हो जो प्यार हुआ भी तो मुझसे
तेरी आँखों से लगातार बहता हुआ पानी हूँ मैं