it is some experience of my life, my laughter, my tears, my struggle for life, for a smile and what could a achieve after distributing a lot of smiles on others faces. Fell my Life by my poetry.
Tuesday, January 19, 2010
चाहतें घर दूसरों का जलाना दुनिया में
मजहब है लहू गैरों का बहाना दुनिया में
कहते हैं अगर वों इसी दुनिया को जन्नत
तो मुझे दोबारा नहीं आना इस दुनिया में
कहाँ हैं वों लोग जो गैरों का भला करते हैं
जनाब एक नेकी को भी घंटो सलाह करते हैं
क्यों जल रहा है आज आदमी से ही आदमी
सुना तो था चरागों से चराग जला करते हैं
पहले इस सफ़र का रिवाज कहाँ ऐसा था
अंजाम ये हुआ है आगाज कहाँ ऐसा था
आज हंसती है खुद मुझपे मेरी ही हंसी
मेरा हंसने का पहले अंदाज कहाँ ऐसा था
तुझको ही सोचते-सोचते शाम होती है
मेरी आँखों से बयां ये सरेआम होती है
जब भी सोचता हूँ तुझे पाने के बारे में
मेरी मोहब्बत मुझपे ही इल्जाम होती है
मेरा दिल तो रहता है हरदम तेरे करीब में
पर मेरी मंजिल छुपी है जुदाई कि सलीब में
वों काम आजाये तेरी जुल्फों को सहलाने में
वों जो हवा लिखी है मेरी सांसों के नसीब में
