वों हमसे हमसफ़र ना चुनने कि वजह पूछते हैं
चोट दिल पर लगी कितनी वों ये कहाँ पूछते है
देख ली हाँ यारो करके हमने एक बार मोहब्बत
वों अब फिर से मोहब्बत में मेरी रजा पूछते हैं
आज तक नहीं भरे वों जो जख्म दिल पर हैं
वों इन जख्मो के दर्द में तो भी मज़ा पूछते हैं
ले गया खुदा छीन कर मुझसे मेरी जिंदगी भी
वों कैसी थी उस वक़्त खुदा कि अदा पूछते हैं
जी रहा हूँ मैं अपनी लाश को कन्धों पर लेकर
वों हमसे फिर भी जिन्दा रहने कि सजा पूछते हैं
कहाँ रखूँगा उसे दिल तो लहुलुहान हो चुका मेरा
वों एक लापता से भी अरुण उसका पता पूछते हैं
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